नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार 18 मार्च को गृह सचिव, विधि सचिव और भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) के सीईओ के साथ महत्वपूर्ण बैठक करेंगे। इस बैठक में आधार कार्ड और वोटर आईडी को आपस में लिंक करने को लेकर चर्चा होगी। यह पहली बार है जब चुनाव आयोग डुप्लीकेट इलेक्ट्रोरल फोटो आइडेंटिटी कार्ड (EPIC) नंबर की समस्या को लेकर इस तरह की उच्चस्तरीय बैठक कर रहा है।
राजनीतिक दलों के साथ भी चर्चा के निर्देश
इसके साथ ही चुनाव आयोग ने देशभर के सभी जिला चुनाव अधिकारियों (DEO) को निर्देश दिया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक करें। आयोग के अनुसार, पूरे देश में लगभग 800 जिलों में 5000 से अधिक बैठकें आयोजित की जाएंगी। इन बैठकों का उद्देश्य मतदाता सूची में गड़बड़ी और फर्जी वोटरों की समस्या पर चर्चा करना है। इन बैठकों की रिपोर्ट 31 मार्च तक चुनाव आयोग को सौंपनी होगी।
तृणमूल कांग्रेस ने सबसे पहले उठाया था मुद्दा
इससे पहले तृणमूल कांग्रेस ने डुप्लीकेट वोटर आईडी को लेकर सवाल उठाए थे। पार्टी ने दावा किया था कि मतदाता सूची में गड़बड़ी के कारण कई मतदाता दोहरे पंजीकरण में शामिल हो रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस के इस मुद्दे को अन्य विपक्षी दलों ने भी समर्थन दिया। इसके बाद पार्टी के एक प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात कर इस मामले में उचित कार्रवाई की मांग की थी।
फर्जी वोटर लिस्ट पर सियासत गरमाई
यह मुद्दा सिर्फ तृणमूल कांग्रेस तक सीमित नहीं है। बीजेपी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAP) समेत कई प्रमुख राजनीतिक दलों ने भी मतदाता सूची में फर्जीवाड़े और फेक वोटरों का मुद्दा उठाया है। पार्टियों का कहना है कि डुप्लीकेट वोटर आईडी और अवैध मतदाता पंजीकरण लोकतंत्र की पारदर्शिता को प्रभावित कर सकते हैं।
आधार-वोटर आईडी लिंकिंग क्यों जरूरी?
सरकार और चुनाव आयोग कई सालों से आधार कार्ड और वोटर आईडी को लिंक करने की प्रक्रिया पर काम कर रहे हैं। इस पहल का मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची को साफ-सुथरा बनाना और डुप्लीकेट वोटर कार्ड जैसी समस्याओं को खत्म करना है। हालांकि, कुछ राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों ने इस पर निजता के उल्लंघन का सवाल भी उठाया है।
क्या कहता है कानून?
चुनाव आयोग को 2021 में मिली कानूनी मंजूरी के तहत अब मतदाता स्वेच्छा से अपना आधार नंबर वोटर आईडी से लिंक कर सकते हैं। हालांकि, यह अनिवार्य नहीं है, लेकिन आयोग का कहना है कि इससे फर्जी मतदाताओं की पहचान करने में मदद मिलेगी।
आगे क्या होगा?
18 मार्च की इस बैठक के बाद यह स्पष्ट होगा कि चुनाव आयोग आधार-वोटर आईडी लिंकिंग पर क्या निर्णय लेता है। साथ ही, 31 मार्च तक आने वाली 5000 से अधिक बैठकों की रिपोर्ट से यह तय होगा कि राजनीतिक दल और जिला प्रशासन इस मुद्दे पर क्या राय रखते हैं।

हमारा उद्देश्य जनता को विश्वसनीय और तथ्यात्मक जानकारी प्रदान करना है, जिससे वे सूचित और सशक्त हो सकें।
“खबरें, जो आपकी आवाज़ बनें”