रांची/दिल्ली : झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का 81 वर्ष की आयु में सोमवार रात दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में निधन हो गया। वे बीते कई सप्ताह से गंभीर रूप से बीमार थे और वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे। उनके पुत्र और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भावुक शब्दों में यह समाचार साझा किया.
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झारखंड की राजनीति और समाज में ‘दिशोम गुरु’ के नाम से विख्यात शिबू सोरेन का जाना केवल एक नेता का जाना नहीं, बल्कि एक पूरे युग का अंत है। वे न सिर्फ झारखंड आंदोलन के प्रणेता थे, बल्कि आदिवासी अस्मिता और अधिकारों की मज़बूत आवाज़ भी थे।
दर्द से उपजा संघर्ष
11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के नेमरा गाँव में जन्मे शिबू सोरेन के जीवन की दिशा महज 15 वर्ष की उम्र में बदल गई, जब उनके पिता शोबरन सोरेन की हत्या महाजनों ने कर दी। यह घटना उनके जीवन में स्थायी जख्म बन गई। इसी दर्द ने उन्हें अन्याय के खिलाफ लड़ने का संकल्प दिया और वे आदिवासी समाज के अधिकारों के लिए संघर्षरत हो गए।
शिक्षा और पारिवारिक जीवन
शिबू सोरेन ने हजारीबाग के गोला हाई स्कूल से मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की। वे एक साधारण किसान परिवार से निकलकर असाधारण जननायक बने। 1 जनवरी 1962 को उन्होंने रूपी सोरेन से विवाह किया। उनके तीन पुत्र और एक पुत्री हैं। बड़े पुत्र दुर्गा सोरेन का 2009 में निधन हो गया। बेटी अंजनी पार्टी की कमान ओडिशा में संभाल रही हैं, छोटे बेटे बसंत सोरेन विधायक हैं, जबकि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पिता की राजनीतिक विरासत को संभाल रखा है।
झारखंड आंदोलन के शिल्पी
1973 में शिबू सोरेन ने एके रॉय और बिनोद बिहारी महतो के साथ झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की। उनका लक्ष्य था आदिवासियों को संगठित करना और उन्हें अलग राज्य की पहचान दिलाना। वे आंदोलन की हर बड़ी रैली और सभा के केंद्र में होते। उनके नेतृत्व ने आंदोलन को जनआंदोलन में बदला और आखिरकार 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य का गठन हुआ।
राजनीतिक जीवन
1980 में पहली बार दुमका से लोकसभा पहुँचे शिबू सोरेन कई बार सांसद चुने गए। वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने और केंद्र सरकार में कोयला मंत्री भी रहे। हालांकि गठबंधन की राजनीति और राजनीतिक समीकरणों के कारण उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल लंबे समय तक नहीं टिक सका।
उनका राजनीतिक जीवन विवादों से भी घिरा रहा। 1975 के चिरुडीह हत्याकांड और 1994 में अपने सहयोगी शशिनाथ झा की हत्या जैसे मामलों में उन पर आरोप लगे, लेकिन बाद में अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। इन मुश्किलों के बावजूद उनकी लोकप्रियता में कभी कमी नहीं आई और वे लगातार आदिवासी समाज के सबसे बड़े नेता बने रहे।
संघर्षों और हमलों से घिरा जीवन
2007 में देवघर के पास उनके काफिले पर बम से हमला हुआ। कई बार राजनीतिक और व्यक्तिगत संकटों का सामना करने के बावजूद शिबू सोरेन हर बार और दृढ़ होकर खड़े हुए। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा जनसेवा और आदिवासी अधिकारों की लड़ाई को समर्पित किया।
विरासत और युगांत
लगभग चार दशकों तक JMM के अध्यक्ष रहे शिबू सोरेन ने अप्रैल 2025 में खुद को पार्टी की मार्गदर्शक भूमिका तक सीमित कर लिया और अध्यक्ष की जिम्मेदारी हेमंत सोरेन को सौंप दी। उनकी विरासत सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है।
झारखंड राज्य का गठन, आदिवासी समाज की राजनीतिक पहचान और हाशिए पर रहे वर्गों की आवाज़ को संसद और विधानसभा तक पहुँचाना – यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।
आज शिबू सोरेन हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके संघर्ष और आदर्श आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बने रहेंगे। झारखंड ही नहीं, पूरा देश उन्हें एक ऐसे जननायक के रूप में याद करेगा जिसने दर्द को ताकत में बदला और अस्मिता को आंदोलन का रूप दिया।

मैं अभिमन्यु कुमार पिछले चार वर्षों से गिरिडीह व्यूज में बतौर “चीफ एडिटर” के रूप में कार्यरत हुं,आप मुझे नीचे दिए गए सोशल मीडिया के द्वारा संपर्क कर सकते हैं।