Success Story Of Suraj Kumar: कहते हैं कि हौसले बुलंद हों और सपनों को पाने का जुनून दिल में हो, तो कोई भी मंज़िल असंभव नहीं रहती। झारखंड के गिरिडीह जिले की कपिलो पंचायत के रहने वाले सूरज यादव ने इस कहावत को अपने जीवन से सच कर दिखाया है। एक दौर था जब सूरज घर-घर जाकर फूड डिलीवरी का काम करते थे और रैपिडो बाइक टैक्सी चलाकर अपना और अपने परिवार का खर्च चलाते थे। लेकिन आज यही सूरज यादव झारखंड सरकार में डिप्टी कलेक्टर बनने जा रहे हैं। उनकी यह कामयाबी केवल एक नौकरी पाना नहीं, बल्कि कठिनाइयों पर जीत और हिम्मत, मेहनत व संकल्प की एक अनोखी मिसाल है।
गरीबी की जकड़न में पला बचपन, मजदूर पिता के बेटे की जिद
सूरज यादव के पिता मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करते थे। घर की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि पढ़ाई जारी रखना भी उनके लिए एक चुनौती से कम नहीं था। परंतु सूरज ने हालातों के आगे घुटने नहीं टेके। उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ डिलीवरी बॉय और रैपिडो ड्राइवर के रूप में काम करना शुरू किया। दिन में मेहनत और रात में पढ़ाई – यही उनका रोज़ का क्रम था।
दोस्तों की मदद और पुरानी बाइक ने बढ़ाए कदम
सपनों को पूरा करने के लिए साधन कम थे, लेकिन सपनों का हौसला बड़ा था। सूरज के दोस्तों ने उनका हौसला बढ़ाया और पुरानी बाइक खरीदने में मदद की। उसी बाइक पर कई किलोमीटर का सफर तय करते हुए उन्होंने डिलीवरी का काम किया और अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। कठिन रास्तों और थकान के बावजूद उनकी नज़र हमेशा एक ही लक्ष्य पर थी – JPSC की परीक्षा पास करना।
पत्नी बनीं सबसे बड़ी प्रेरणा
सूरज की इस यात्रा में उनकी पत्नी का योगदान बेहद खास रहा। जब सूरज थककर काम से लौटते, तो उनकी पत्नी ही उन्हें आगे बढ़ने का हौसला देतीं। सूरज खुद स्वीकारते हैं कि अगर उनकी पत्नी का साथ और प्रोत्साहन नहीं होता, तो शायद यह सफलता इतनी जल्दी हासिल न होती।
दूसरे प्रयास में मिली सफलता
सूरज यादव का यह सफर असफलता से भी होकर गुज़रा। पहले प्रयास में JPSC परीक्षा पास न कर पाने के बाद उन्होंने हार नहीं मानी। पत्नी और दोस्तों के सहयोग से उन्होंने एक बार फिर पढ़ाई में पूरी ताकत झोंक दी और आखिरकार दूसरे प्रयास में 110वीं रैंक हासिल कर यह दिखा दिया कि असफलता मंज़िल नहीं, बल्कि सफलता की राह का एक पड़ाव है।
नौकरी से बढ़कर प्रेरणा
सूरज यादव का डिप्टी कलेक्टर बनना केवल उनकी व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो कठिन परिस्थितियों में अपने सपनों को साकार करने की हिम्मत रखते हैं। यह कहानी हमें बताती है कि साधनों की कमी कभी भी सपनों की राह नहीं रोक सकती, अगर संकल्प मजबूत हो और मेहनत सच्ची।
आज जब सूरज यादव प्रशासनिक सेवा की जिम्मेदारी संभालने जा रहे हैं, उनकी कहानी यह संदेश देती है – “कड़ी मेहनत और दृढ़ निश्चय से असंभव भी संभव बनाया जा सकता है।”