माता–पिता के साए के बिना भी नहीं टूटी हिम्मत: ट्यूशन और मंईयां योजना के सहारे रूपम बनीं सबसे युवा JPSC अफसर

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रांची: झारखंड के खूंटी जिले की 22 वर्षीय रूपम सोनाल की कहानी सिर्फ संघर्षों से जूझने की कहानी नहीं, बल्कि उन संघर्षों को हराकर मुकाम हासिल करने की गाथा है। बेहद कम उम्र में माता-पिता का साया खो देने के बाद भी रूपम ने हिम्मत नहीं हारी और आज वे झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की 13वीं सिविल सेवा परीक्षा में सफलता पाकर राज्य की सबसे युवा अफसर बन गई हैं।

रूपम का बचपन बेहद कठिनाइयों में बीता। मात्र 11 वर्ष की उम्र में उनके पिता का निधन हार्ट अटैक से हो गया, और 16 वर्ष की आयु में ब्लड कैंसर ने उनकी मां को भी उनसे छीन लिया। ऐसे समय में, जब ज्यादातर बच्चे अपने माता-पिता की छाया में आगे बढ़ते हैं, रूपम को अकेले ही जीवन की लड़ाई लड़नी पड़ी।

कठिन परिस्थितियों के बावजूद, उन्होंने हार मानना स्वीकार नहीं किया। आर्थिक तंगी थी, लेकिन रूपम ने ट्यूशन पढ़ाकर न केवल अपना दैनिक खर्च चलाया, बल्कि पढ़ाई को भी निरंतर जारी रखा। वे लगातार 11वीं, 12वीं और 13वीं जेपीएससी में शामिल हुईं—और आखिरकार मेहनत व दृढ़ इच्छाशक्ति के दम पर 13वीं सिविल सेवा परीक्षा में सफलता हासिल की।

बीते महीनों में ‘मंईयां सम्मान योजना’ से मिली आर्थिक सहायता ने उनकी तैयारी में अहम भूमिका निभाई। इसी सहयोग के चलते वे अपनी पढ़ाई को व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ा सकीं। शुक्रवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हाथों नियुक्ति पत्र प्राप्त करते हुए रूपम ने कहा कि उनके जन्म पर परिवार में उत्साह कम था क्योंकि घर में पहले से ही दो बेटियां थीं। लेकिन आज, अपनी उपलब्धि से उन्होंने न केवल परिवार, बल्कि पूरे जिले का नाम रोशन किया है।

रूपम ने कहा कि यह सफलता केवल उनकी नहीं, बल्कि उन सभी लड़कियों की है जो कठिन परिस्थितियों में भी सपने देखने का साहस रखती हैं। उन्होंने यह भी संदेश दिया कि आर्थिक या सामाजिक बाधाएं चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, निरंतर प्रयास और विश्वास इंसान को मंज़िल तक पहुंचा ही देते हैं।

रूपम सोनाल की यह सफलता न सिर्फ झारखंड बल्कि पूरे देश की बेटियों के लिए प्रेरणा है—एक ऐसी मिसाल, जो बताती है कि हालात चाहे कितने भी प्रतिकूल हों, हिम्मत और संघर्ष की रोशनी हमेशा रास्ता दिखाती है।

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