सड़क नहीं तो खाट बनी एंबुलेंस, पीरटांड़ की तस्वीर ने खोली विकास की पोल प्रसव पीड़ा में महिला को 4 किलोमीटर ढोया, ग्रामीणों में भारी नाराजगी

सड़क नहीं, तो जिंदगी भी मुश्किल — खाट पर अस्पताल पहुंची गर्भवती महिला।

Abhimanyu Kumar
4 Min Read
Highlights
  • सड़क नहीं होने से गर्भवती महिला को खाट पर अस्पताल ले जाया गया।
  • ग्रामीणों ने चार किलोमीटर तक पैदल महिला को ढोया।
  • कई गांव वर्षों से सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित।
  • एंबुलेंस ने गांव तक पहुंचने से किया इंकार।
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गिरिडीह: पीरटांड़ में सड़क के अभाव ने एक बार फिर ग्रामीण व्यवस्था की बदहाली को उजागर कर दिया है। आजादी के 75 वर्ष पूरे होने के बावजूद कई गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। ताजा मामला पीरटांड़ प्रखंड के मधुबन थाना क्षेत्र अंतर्गत दालुवाडीह गांव का है, जहां प्रसव पीड़ा से तड़प रही एक गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए परिजनों और ग्रामीणों को खाट का सहारा लेना पड़ा। सड़क नहीं होने के कारण महिला को करीब चार किलोमीटर तक उबड़-खाबड़ रास्तों से पैदल ढोकर मुख्य सड़क तक पहुंचाया गया, तब जाकर उसे अस्पताल भेजा जा सका।

जानकारी के अनुसार दालुवाडीह गांव निवासी सुनीता सोरेन को शुक्रवार सुबह अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिजनों ने तत्काल स्वास्थ्य विभाग और एंबुलेंस सेवा को इसकी सूचना दी, लेकिन गांव तक सड़क नहीं होने का हवाला देते हुए एंबुलेंस कर्मियों ने गांव में आने से इंकार कर दिया। इसके बाद परिवार के लोगों के साथ ग्रामीणों ने मिलकर सुनीता सोरेन को खाट पर लिटाया और कठिन रास्तों से करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर पिपराडीह मुख्य सड़क तक पहुंचाया। वहां किसी तरह वाहन की व्यवस्था कर उन्हें नजदीकी अस्पताल भेजा गया।

घटना के दौरान ग्रामीणों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। कच्चे और पथरीले रास्ते, बारिश के कारण कीचड़ और बीच-बीच में ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय पर सड़क और एंबुलेंस की सुविधा उपलब्ध रहती, तो गर्भवती महिला को इस तरह जान जोखिम में डालकर अस्पताल नहीं पहुंचाना पड़ता।

 

ग्रामीणों ने बताया कि पिपराडीह तक सड़क बनी हुई है, लेकिन उसके आगे दालुवाडीह समेत कई गांवों तक सड़क निर्माण कार्य वर्षों से अधूरा पड़ा है। सड़क नहीं होने से कुरुवारांड, दालुवाडीह, डाहिया, ईटाबेड़ा, गाड़ापरोम, सहेरबेड़ा, जिरबेड़ा, सतकटिया और बोरवाबेड़ा जैसे कई गांव प्रभावित हैं। इन गांवों में रहने वाले लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। विशेष रूप से बरसात के मौसम में हालात और भयावह हो जाते हैं, जब बीमार, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को अस्पताल तक पहुंचाना लगभग असंभव हो जाता है।

 

घटना के बाद ग्रामीणों में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। ग्रामीण बुधन सोरेन, सुशील मुर्मू, सानो मरांडी, गोपाल मुर्मू, सोमरा मुर्मू, पतिराम मरांडी और बाबूलाल हांसदा समेत कई लोगों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर उपेक्षा का आरोप लगाया है।

ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय सड़क, स्वास्थ्य और विकास के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही गांवों की समस्याओं को भुला दिया जाता है। उनका आरोप है कि वर्षों से सड़क निर्माण की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई।

 

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द सड़क निर्माण कार्य शुरू नहीं कराया गया, तो आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में वे मतदान का बहिष्कार करेंगे। उनका कहना है कि जब तक गांव तक सड़क, एंबुलेंस और स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुंचेगी, तब तक वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने पर पुनर्विचार करेंगे।

 

स्थानीय लोगों ने यह भी बताया कि यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई बार बीमार मरीजों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को खाट या अन्य अस्थायी साधनों के सहारे अस्पताल पहुंचाना पड़ा है। बावजूद इसके प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने इस गंभीर समस्या की ओर ध्यान नहीं दिया। अब खाट पर गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने की तस्वीरें और वीडियो पूरे इलाके में चर्चा का विषय बने हुए हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में विकास के दावों पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

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