झारखंड की आदिवासी नेत्री निशा भगत की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत से राज्य के सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है। शुक्रवार को उनकी मौत की खबर सामने आने के बाद आदिवासी समाज में शोक के साथ-साथ कई सवाल भी उठने लगे हैं। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, उन्होंने कथित तौर पर आत्महत्या की है। बताया जा रहा है कि गंभीर हालत में उन्हें रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) ले जाया गया था, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

मौत से पहले फेसबुक लाइव में छलका था दर्द
निशा भगत की मौत से पहले उनका एक फेसबुक लाइव सोशल मीडिया पर चर्चा में है। इस वीडियो में वह काफी भावुक दिखाई दे रही थीं। रोते हुए उन्होंने अपनी परेशानियों और पीड़ा को सार्वजनिक किया था। इस दौरान उन्होंने झारखंड सरकार, पुलिस प्रशासन और कुछ लोगों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए थे। उन्होंने अपनी सुरक्षा को लेकर भी चिंता जाहिर की थी।
सोशल मीडिया पर उनकी मौत के लिए कथित तौर पर पुलिस और जमीन दलालों को जिम्मेदार ठहराने वाली पोस्ट भी सामने आ रही हैं। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। पूरे मामले की वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
आदिवासी अधिकारों की लड़ाई में रही थीं सक्रिय
निशा भगत आदिवासी समाज के अधिकारों, सरना धर्म की पहचान और जल, जंगल एवं जमीन से जुड़े मुद्दों को लेकर लगातार सक्रिय रही थीं। वर्ष 2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने गुमला विधानसभा सीट से भी अपनी किस्मत आजमाई थी। सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर मुखर रहने के कारण उनकी पहचान एक सक्रिय आदिवासी नेत्री के रूप में बनी थी।
पहले भी दर्ज कराई थी धमकी और रंगदारी की शिकायत
इस पूरे मामले में जुलाई 2026 की एक पुरानी शिकायत भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जानकारी के अनुसार, निशा भगत ने उस समय जान से मारने की धमकी मिलने और पांच लाख रुपये की रंगदारी मांगे जाने की शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने इस संबंध में रांची साइबर थाने में आवेदन दिया था।

अब उनकी मौत के बाद यह सवाल उठ रहा है कि पूर्व में मिली धमकियों को लेकर पुलिस ने क्या कार्रवाई की थी? क्या उन्हें पर्याप्त सुरक्षा दी गई थी और क्या उनकी शिकायतों पर गंभीरता से जांच हुई थी?
निष्पक्ष जांच की उठ रही मांग
निशा भगत की मौत के बाद उनके फेसबुक लाइव, पूर्व में दर्ज शिकायतों और मौत से पहले की परिस्थितियों को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष और गहन जांच बेहद जरूरी हो गई है।
यह घटना केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता की मौत का मामला नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज की सुरक्षा और सामाजिक मुद्दों को लेकर आवाज उठाने वाली महिलाओं की सुरक्षा से भी जुड़ी हुई है।
फिलहाल, उनकी मौत के वास्तविक कारणों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। पुलिस जांच के बाद ही पूरे घटनाक्रम की सच्चाई सामने आ सकेगी। अब सबकी नजर इस बात पर है कि जांच एजेंसियां इस मामले में क्या कदम उठाती हैं और निशा भगत की ओर से पहले लगाए गए आरोपों की पड़ताल किस तरह की जाती है।

मैं अभिमन्यु कुमार पिछले चार वर्षों से गिरिडीह व्यूज में बतौर “चीफ एडिटर” के रूप में कार्यरत हुं,आप मुझे नीचे दिए गए सोशल मीडिया के द्वारा संपर्क कर सकते हैं।