शादी की हल्दी के बाद बाहर जाना क्यों है मना? धार्मिक मान्यता से लेकर वैज्ञानिक कारण तक, जानिए पूरी सच्चाई….

शादी की हल्दी सिर्फ रस्म नहीं, बल्कि परंपरा, विज्ञान और आस्था का संगम है। हल्दी लगने के बाद बाहर न जाने की मान्यता दूल्हा-दुल्हन की सकारात्मक ऊर्जा, त्वचा की सुरक्षा और वैवाहिक जीवन की शुभ शुरुआत से जुड़ी मानी जाती है।

Abhimanyu Kumar
3 Min Read
Highlights
  • हल्दी की रस्म को हिंदू विवाह में शुभता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
  • वैज्ञानिक रूप से हल्दी त्वचा को संवेदनशील बनाती है, इसलिए धूप और धूल से बचाव जरूरी होता है।
  • सामाजिक रूप से यह रस्म परिवार के साथ समय बिताने और रिश्तों को मजबूत करने का अवसर देती है।
  • धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हल्दी के बाद बाहर जाने से नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ सकता है।
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शादी का सीजन आते ही लोगों के मन में कई सवाल उठने लगते हैं। इन्हीं में से एक सवाल अक्सर चर्चा में रहता है—आख़िर हल्दी की रस्म के बाद दूल्हा-दुल्हन को घर से बाहर क्यों नहीं जाने दिया जाता?

क्या यह सिर्फ परंपरा है या इसके पीछे कोई गहरा कारण भी छुपा है? आइए जानते हैं इस खास रस्म से जुड़ी पूरी कहानी।

हल्दी रस्म: सिर्फ सौंदर्य नहीं, शुभ शुरुआत का संकेत

हिंदू विवाह में हल्दी की रस्म बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह रस्म शादी से एक-दो दिन पहले निभाई जाती है, जिसमें दूल्हा और दुल्हन के शरीर पर हल्दी लगाई जाती है। माना जाता है कि हल्दी न सिर्फ त्वचा में निखार लाती है, बल्कि नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर मन को शांत भी करती है।

धार्मिक मान्यता: पॉजिटिव एनर्जी की सुरक्षा

धार्मिक दृष्टि से हल्दी को शुभता और सुरक्षा का प्रतीक माना गया है। मान्यता है कि हल्दी लगाने के बाद शरीर के चारों ओर एक तरह की सकारात्मक ऊर्जा का कवच बन जाता है।

ऐसे में अगर दूल्हा-दुल्हन बाहर निकलते हैं और किसी नकारात्मक ऊर्जा के संपर्क में आते हैं, तो विवाह में बाधा आ सकती है। इसी कारण हल्दी के बाद घर से बाहर जाने की मनाही की जाती है।

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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, हल्दी की खुशबू का संबंध राहु-केतु जैसे ग्रहों से भी जोड़ा जाता है। हल्दी के बाद बाहर जाने से इन ग्रहों का प्रभाव बढ़ सकता है, जिससे मानसिक तनाव या अस्थिरता हो सकती है।

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वैज्ञानिक कारण: त्वचा की सुरक्षा जरूरी

धार्मिक कारणों के साथ-साथ इसके पीछे वैज्ञानिक वजह भी है। हल्दी एक नेचुरल एंटीसेप्टिक है, जो त्वचा के पोर्स खोल देती है। हल्दी लगाने के बाद त्वचा बेहद संवेदनशील हो जाती है।

ऐसे में धूप, धूल या प्रदूषण के संपर्क में आने से त्वचा पर जलन, एलर्जी या कालापन हो सकता है। पुराने समय में इसी वजह से हल्दी के बाद बाहर जाने से बचने की सलाह दी जाती थी।

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सामाजिक पहलू: परिवार के साथ खास पल

हल्दी की रस्म का एक सामाजिक महत्व भी है। इस रस्म के बाद दूल्हा-दुल्हन को घर में रहने की सलाह इसलिए दी जाती है ताकि वे परिवार और रिश्तेदारों के साथ इस खास समय को खुलकर जी सकें।

गीत-संगीत, हंसी-मजाक और पारिवारिक अपनापन—ये पल वैवाहिक जीवन की मजबूत नींव माने जाते हैं।

निष्कर्ष

हल्दी की रस्म केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि धार्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक तीनों दृष्टि से बेहद खास है। यही कारण है कि आज भी शादी के मौसम में लोग इस रस्म को पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ निभाते हैं।

डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है। किसी भी मान्यता को अपनाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।

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