Sucess story: 8 गायों से शुरू हुआ सफर, आज 50 दुधारू पशुओं की आधुनिक डेयरी के मालिक बने सोनल कांडवेय…

“मेहनत, आधुनिक तकनीक और सरकारी सहयोग से बदली गांव के युवा की तकदीर”

Abhimanyu Kumar
4 Min Read
Highlights
  • झारखंड सरकार की कामधेनु योजना से मिला बड़ा सहयोग
  • 10 एकड़ में हरे चारे और साइलेज का उत्पादन
  • वर्मी कम्पोस्ट और जैविक खेती से अतिरिक्त आय
  • 8 गायों से शुरू किया डेयरी व्यवसाय
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गिरिडीह: मेहनत, लगन और सही दिशा में किए गए प्रयास किसी भी इंसान की तकदीर बदल सकते हैं। गिरिडीह जिले के महेशलुंडी गांव के रहने वाले युवा पशुपालक सोनल कांडवेय ने इसे सच साबित कर दिखाया है। कभी सिर्फ 8 गायों से डेयरी व्यवसाय शुरू करने वाले सोनल आज 50 दुधारू पशुओं की आधुनिक डेयरी फार्मिंग यूनिट खड़ी करने की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। उनकी यह सफलता आज पूरे इलाके के किसानों और युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है।

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साल 2010 में सीमित संसाधनों के बीच शुरू हुआ यह सफर आसान नहीं था। शुरुआती दिनों में आर्थिक तंगी, पशुओं के रखरखाव और चारे की व्यवस्था जैसी कई चुनौतियां सामने आईं, लेकिन सोनल कांडवेय ने हार मानने के बजाय आधुनिक तकनीकों को अपनाया। उन्होंने वैज्ञानिक ब्रीडिंग, बेहतर पोषण और पशुओं के स्वास्थ्य प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया। धीरे-धीरे उनका छोटा डेयरी फार्म एक संगठित और आधुनिक डेयरी मॉडल में बदलता चला गया।

 

सोनल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे अपने पशुओं के लिए हरा चारा खुद तैयार करते हैं। करीब 10 एकड़ जमीन पर वे बाजरा, मक्का और बरसीम की खेती करते हैं। गर्मियों में बाजरा और सर्दियों में बरसीम उत्पादन कर पशुओं को पौष्टिक आहार दिया जाता है। इसके अलावा मक्का से साइलेज तैयार कर पूरे साल हरे चारे की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है। उनके फार्म में हर साल करीब 100 टन साइलेज तैयार होता है, जिससे दूध उत्पादन और पशुओं के स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

 

डेयरी व्यवसाय के साथ-साथ सोनल जैविक खेती को भी बढ़ावा दे रहे हैं। फार्म से निकलने वाले गोबर का उपयोग खेतों में प्राकृतिक खाद के रूप में किया जाता है। उन्होंने वर्मी कम्पोस्ट यूनिट भी स्थापित की है, जिससे जैविक खाद बनाकर अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है। इससे खेती की लागत कम होने के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती मिल रही है।

 

सोनल कांडवेय की मेहनत को नई रफ्तार तब मिली जब उन्हें झारखंड सरकार की “कामधेनु डेयरी फार्मिंग योजना” का लाभ मिला। वित्तीय वर्ष 2024-25 में लगभग 39.75 लाख रुपये की लागत वाली 50 दुधारू पशुओं की डेयरी परियोजना स्वीकृत हुई। पहले चरण में 25 पशुओं की खरीद पूरी हो चुकी है, जबकि बाकी पशुओं की व्यवस्था की प्रक्रिया जारी है।

 

सोनल बताते हैं कि डेयरी व्यवसाय में केवल दूध उत्पादन ही सफलता की कुंजी नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक ब्रीडिंग, चारा उत्पादन, साइलेज निर्माण और जैविक खाद निर्माण जैसे पहलुओं पर समान ध्यान देना जरूरी है। यही वजह है कि उनका फार्म आज एक समग्र कृषि एवं पशुपालन मॉडल के रूप में पहचान बना रहा है।

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वे अपनी सफलता का श्रेय अपनी मेहनत के साथ-साथ झारखंड सरकार और गव्य विकास विभाग को भी देते हैं। उनका कहना है कि विभाग द्वारा समय-समय पर मिले प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और सरकारी सहयोग ने उनके डेयरी व्यवसाय को नई ऊंचाई तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

आज सोनल कांडवेय का डेयरी फार्म सिर्फ एक व्यवसाय नहीं, बल्कि ग्रामीण आत्मनिर्भरता और आधुनिक पशुपालन का जीवंत उदाहरण बन चुका है। उनकी कहानी यह साबित करती है कि अगर युवा मेहनत और नई सोच के साथ आगे बढ़ें, तो गांवों में रहकर भी बड़े सपनों को साकार किया जा सकता है।

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