रांची: झारखंड की समृद्ध आदिवासी परंपरा और लोक संस्कृति की धड़कन कहे जाने वाले पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘मांदर’ को औपचारिक रूप से ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग प्रदान कर दिया गया है। सदियों से राज्य के पर्व-त्योहारों, करम-सरहुल जैसे लोक नृत्यों और सामाजिक उत्सवों की पहचान रहे मांदर को मिली यह मान्यता झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर और इसे तैयार करने वाले स्थानीय कारीगरों के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।
खास मिट्टी और अनूठी थाप को मिली आधिकारिक मुहर
मांदर केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि झारखंड की अस्मिता का प्रतीक है। इसकी विशिष्ट बनावट, स्थानीय मिट्टी का लेप और इसकी गूंजती थाप इसे अन्य ताल वाद्यों से अलग बनाती है। जीआई टैग मिलने से अब मांदर की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान कानूनी रूप से संरक्षित हो गई है, जिससे इसकी प्रामाणिकता और अनूठी निर्माण कला को राष्ट्रीय स्तर पर संबल मिलेगा।
2021 से चल रही थी प्रक्रिया
मांदर को जीआई टैग दिलाने की कवायद वर्ष 2021 में शुरू की गई थी। इस पूरी प्रक्रिया में नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (NUSRL), रांची के बौद्धिक संपदा विशेषज्ञ डॉ. सत्यदीप सिंह की अहम भूमिका रही। जनवरी 2025 में नई दिल्ली में आयोजित अंतिम सुनवाई के दौरान मांदर की विशिष्टता और ऐतिहासिकता से जुड़े साक्ष्य मजबूती से प्रस्तुत किए गए थे।
ऐतिहासिक दस्तावेजों ने पुख्ता किया दावा
मांदर की प्राचीनता को साबित करने के लिए कई ऐतिहासिक व मानवशास्त्रीय साक्ष्यों का सहारा लिया गया:
शरत चंद्र राय (1915): प्रख्यात मानवशास्त्री की कृतियों में मांदर के सामाजिक महत्व का उल्लेख।
तारकचंद्र दास (1931) व डब्ल्यू. जी. आर्चर (1940): आर्चर की प्रसिद्ध पुस्तक ‘द ब्लू ग्रोव’ में मांदर की भूमिका का वर्णन।
संग्रहालय व गजेटियर रिकॉर्ड्स: पटना संग्रहालय की 1920 की वार्षिक रिपोर्ट, भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की 1956 की पुस्तक ‘फोक डांसेज इन इंडिया’ और रांची से संबंधित तत्कालीन बिहार जिला गजेटियर में दर्ज ऐतिहासिक संदर्भ।
स्थानीय कारीगरों के लिए खुलेंगे आर्थिक रास्ते
जीआई टैग मिलने से मांदर बनाने वाले पारंपरिक शिल्पकारों को सीधा लाभ पहुंचेगा:
नकली उत्पादों से सुरक्षा: बाजार में मशीन निर्मित या अन्य क्षेत्रों के डुप्लिकेट उत्पादों पर रोक लगेगी।
वैश्विक बाजार तक पहुंच: पारंपरिक कारीगरों के हुनर को सही मूल्य मिलेगा और ई-कॉमर्स व राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मेलों में बेहतर अवसर बनेंगे।
कला का संरक्षण: युवा पीढ़ी को इस पारंपरिक कला से जुड़े रहने के लिए आर्थिक संबल और प्रोत्साहन मिलेगा।