मुख्यमंत्री से मिला था सम्मान, आज जंगल बचाने वालों की सुनने वाला कोई नहीं; छलका जयनारायण महतो का दर्द

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गिरिडीह:  एक समय ऐसा था जब जंगल बचाने के लिए किए गए प्रयासों की सराहना होती थी, लेकिन आज जंगलों की रक्षा में जुटे लोगों का हाल पूछने वाला भी कोई नहीं है। यह पीड़ा महुआतार जंगल समिति के अध्यक्ष जयनारायण महतो ने व्यक्त की। उन्होंने कहा कि वर्षों से ग्रामीणों के सहयोग से लगभग 1000 एकड़ में फैले महुआतार जंगल को सुरक्षित रखा गया है, लेकिन जंगल बचाने वालों को अब न सम्मान मिल रहा है और न ही अपेक्षित सहयोग।

हाल ही में महुआतार जंगल में हुई विशेष बातचीत के दौरान जयनारायण महतो ने जंगल संरक्षण से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने रखा। उन्होंने बताया कि जंगल को बचाने के लिए समिति के सदस्य दिन-रात निगरानी करते हैं। कई बार अवैध लकड़ी तस्करों और पेड़ काटने वालों को रोकना पड़ता है, जिसके कारण उन्हें विरोध, अपमान और मानसिक दबाव का सामना भी करना पड़ता है।

 

जयनारायण महतो ने बताया कि वर्ष 2011 में तत्कालीन झारखंड के मुख्यमंत्री ने जंगल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें लकड़ी से बनी साइकिल देकर सम्मानित किया था। यह सम्मान उनके लिए गर्व का क्षण था और इससे उन्हें जंगल बचाने के लिए और अधिक प्रेरणा मिली थी।

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उन्होंने कहा कि उस सम्मान के बाद आज तक किसी भी विभाग या संस्था ने उनके कार्यों की सुध नहीं ली। पहले वन विभाग के रेंजर और फॉरेस्टर समय-समय पर जंगल का निरीक्षण करने आते थे, जंगल समिति के सदस्यों का उत्साह बढ़ाते थे और उनके प्रयासों की सराहना करते थे। लेकिन अब ऐसी सक्रियता लगभग समाप्त हो गई है।

 

उन्होंने यह भी कहा कि विश्व पर्यावरण दिवस जैसे अवसरों पर भी जंगल संरक्षण में लगे लोगों को सम्मानित नहीं किया जाता। इससे जंगल बचाने वाले लोगों का मनोबल प्रभावित होता है और उनके प्रयासों को वह पहचान नहीं मिल पाती जिसके वे हकदार हैं।

महुआतार जंगल बिजली बथान, मोतीलेडा, बरसोली, खंडोली, बालगो और डोमपहाड़ी समेत कई गांवों से जुड़ा हुआ है। यह जंगल क्षेत्र पर्यावरण संरक्षण, जल स्रोतों की सुरक्षा और जैव विविधता के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

 

इस दौरान समता फेलो नवीन कुमार उर्फ नवीन राज टाइगर ने जयनारायण महतो से विस्तृत बातचीत कर उनकी समस्याओं और चिंताओं को सुना। उन्होंने आश्वासन दिया कि जंगल संरक्षण से जुड़े इन मुद्दों और ग्रामीणों की मांगों को प्रशासन एवं संबंधित विभागों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा, ताकि जंगल बचाने वालों को आवश्यक सम्मान, सहयोग और प्रोत्साहन मिल सके।

 

जंगल संरक्षण के लिए समर्पित लोगों की यह पीड़ा कई सवाल खड़े करती है कि आखिर पर्यावरण बचाने वालों को वह सम्मान और सहयोग कब मिलेगा, जिसके वे वास्तविक हकदार हैं।

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