कोयले से बनेगा पेट्रोल-डीजल! भारत की नई ऊर्जा क्रांति क्या बदल देगी देश का भविष्य?

कोयले से पेट्रोल-डीजल बनाने की तैयारी, सरकार लाई 37,500 करोड़ की योजना

Abhimanyu KumarPintu Kumar
5 Min Read
Highlights
  • सरकार ने 37,500 करोड़ रुपये की योजना घोषित की
  • Coal To Liquid (CTL) तकनीक का होगा इस्तेमाल
  • 3 लाख करोड़ रुपये तक निवेश आने की संभावना
  • कोयले से गैस, पेट्रोल और डीज़ल बनाने की तैयारी
  • हर साल 7.5 करोड़ टन कोयले का गैसीकरण
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रान युद्ध और वैश्विक तनाव के बीच दुनिया भर में पेट्रोल, डीज़ल और गैस की बढ़ती कीमतों को लेकर चर्चा हो रही है। भारत में भी ऊर्जा बचत और वैकल्पिक ईंधन को लेकर कई कदम उठाए जा रहे हैं। लेकिन इसी बीच केंद्र सरकार की एक बड़ी योजना पर लोगों का ध्यान कम गया है, जबकि यह आने वाले समय में भारत की ऊर्जा व्यवस्था को पूरी तरह बदल सकती है।

 

हाल ही में केंद्रीय मंत्री Ashwini Vaishnaw ने घोषणा की कि सरकार कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) के लिए 37,500 करोड़ रुपये की बड़ी योजना लेकर आ रही है। पहली नजर में यह सिर्फ कोयला उद्योग से जुड़ी योजना लग सकती है, लेकिन असल में इसका उद्देश्य देश में ही पेट्रोल, डीज़ल और गैस तैयार करना है।

क्या कोयले से बन सकता है पेट्रोल और डीज़ल?

सुनने में यह थोड़ा तकनीकी और हैरान करने वाला लग सकता है, लेकिन दुनिया के कई देश वर्षों से कोयले से ईंधन बना रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में कोयले से बने पेट्रोल और डीज़ल का इस्तेमाल लंबे समय से हो रहा है।

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भारत दुनिया के सबसे बड़े कोयला भंडार वाले देशों में शामिल है। सरकार का कहना है कि देश में इतना कोयला मौजूद है कि यह करीब 200 वर्षों तक चल सकता है। अब इसी संसाधन का उपयोग कर देश में पेट्रोल, डीज़ल, सीएनजी और अन्य गैसें बनाने की तैयारी हो रही है।

क्या है Coal to Liquid (CTL) तकनीक?

कोयले से पेट्रोल और डीज़ल बनाने की प्रक्रिया को CTL यानी “Coal to Liquid” तकनीक कहा जाता है। यह मुख्य रूप से दो चरणों में पूरी होती है।

पहला चरण: गैसीकरण (Gasification)

सबसे पहले कोयले को बारीक पाउडर में बदला जाता है। इसके बाद इसे एक विशेष रिएक्टर में डाला जाता है, जिसे गैसीफायर कहा जाता है। यहां 700 से 1500 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान और हाई प्रेशर बनाया जाता है।

इस दौरान कोयले में नियंत्रित मात्रा में ऑक्सीजन और पानी की भाप मिलाई जाती है। ध्यान रखा जाता है कि कोयला जले नहीं, बल्कि रासायनिक प्रतिक्रिया के जरिए गैस में बदल जाए।

इस प्रक्रिया से जो गैस बनती है उसे “सिनगैस” यानी सिंथेटिक गैस कहा जाता है। इसमें मुख्य रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) और हाइड्रोजन (H₂) मौजूद होते हैं।

दूसरा चरण: फिशर-ट्रॉप सिंथेसिस (Fischer-Tropsch Process)

इसके बाद इस सिनगैस को साफ करके एक विशेष रिएक्टर में कैटेलिस्ट और हाई प्रेशर के साथ भेजा जाता है। नियंत्रित तापमान पर यह गैस तरल ईंधन में बदल जाती है।

यहीं से पेट्रोल, डीज़ल, जेट फ्यूल और कई अन्य रसायन तैयार किए जा सकते हैं। यानी कोयले से बनी गैस को आगे प्रोसेस करके सीधे वाहन चलाने लायक ईंधन तैयार किया जा सकता है।

क्या इससे CNG और PNG भी बन सकती है?

हाँ। CTL प्रक्रिया के पहले चरण में बनी सिनगैस से सीएनजी और पीएनजी जैसी गैसें भी तैयार की जा सकती हैं। इन्हें मौजूदा गैस पाइपलाइन और सीएनजी पंपों के जरिए सप्लाई किया जा सकता है। इसके लिए अलग से नई व्यवस्था बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

क्या यह ईंधन सुरक्षित है?

विशेषज्ञों के अनुसार कोयले से बने सिंथेटिक ईंधन में सल्फर की मात्रा काफी कम होती है। इससे इंजन पर कम असर पड़ता है और प्रदूषण भी कम हो सकता है। यानी यह पारंपरिक पेट्रोल-डीज़ल की तुलना में अधिक साफ ईंधन माना जाता है।

सरकार की योजना से क्या होंगे फायदे?

सरकार के अनुसार इस योजना के तहत हर साल करीब 7.5 करोड़ टन कोयले का गैसीकरण किया जाएगा। इसके लिए देश में लगभग 3 लाख करोड़ रुपये का निवेश आने की संभावना है।

इसके अलावा हजारों रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि भारत की विदेशी तेल और गैस पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे कच्चे तेल के आयात पर होने वाला भारी खर्च भी घट सकता है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह योजना?

आज भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के रूप में विदेशों से आयात करता है। वैश्विक युद्ध या संकट के समय तेल की कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं, जिसका सीधा असर आम जनता पर पड़ता है।

ऐसे में अगर भारत अपने ही कोयले से पेट्रोल, डीज़ल और गैस बनाने में सफल होता है, तो यह देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।

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